शरद पूर्णिमा का महत्व, महिमा व विधान

शरद पूर्णिमा का महत्व,महिमा व पूजन वैदिक विधान

जैसे कि नाम से सब साफ साफ होता है कि शरद यानी शरद ऋतू और पूर्णिमा यानी माह की पूर्णिमा।
आश्विन माह की पूर्णिमा ही शरद पूर्णिमा का पर्व होता है।
शरद पूर्णिमा सनातन धर्म की अत्यंत पवित्र पूर्णिमाओं में से एक मानी जाती है। इस दिन चन्द्रमा अपनी पूरी कलाओं में होता है। यह पर्व चंद्रदेव, माता लक्ष्मी तथा भगवान श्रीकृष्ण की आराधना से विशेष रूप से जुड़ा है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, कौमुदी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

पौराणिक मान्यताये

  1. माता लक्ष्मी का कोजागरी भ्रमण
    लोक-परंपरा में मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि माता लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करती हैं और देखती हैं—
    “को जागर्ति?” — यानी कौन जाग रहा है?
    इसी कारण इस रात्रि में जागरण करके माता लक्ष्मी की आराधना करने की परंपरा है। भक्त माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं कि उनके घर में धन, धान्य, सुख, शांति और सद्बुद्धि बनी रहे।
  2. भगवान श्रीकृष्ण का महारास
    शरद पूर्णिमा का संबंध श्रीकृष्ण के महारास से भी माना जाता है। ब्रज की भक्ति परंपरा में यह रात्रि अत्यंत विशेष है। इसलिए राधा-कृष्ण का पूजन, संकीर्तन, भजन और नाम-स्मरण करना विशेष भक्तिपूर्ण माना जाता है।
  3. चंद्रदेव की विशेष आराधना
    इस रात्रि का चंद्रमा अत्यंत मनोहर दिखाई देता है। धार्मिक परंपरा में चंद्रमा को मन, शीतलता, सौम्यता और मानसिक प्रसन्नता से जोड़ा गया है। इसलिए चंद्रदेव को अर्घ्य देकर उनसे मन की शांति और सौम्यता की प्रार्थना की जाती है। शरद पूर्णिमा पर वैदिक पूजन-विधि
    प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र या सपेद वस्त्र धारण करें।
    घर एवं पूजा स्थान की सफाई करें। संभव हो तो गंगाजल या पवित्र जल का छिड़काव करें।
    भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण का स्मरण करें। फिर संध्या पूजन में लक्ष्मी-नारायण अथवा राधा-कृष्ण की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।

पूजन सामग्री:
जल, पंचामृत, रोली, अक्षत, पुष्प, कमल, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, मिष्ठान्न, दूध, खीर तथा दक्षिणा।
इसके बाद क्रम से—
आचमन → संकल्प → गणेश पूजन → कलश पूजन → लक्ष्मी पूजन → विष्णु/कृष्ण पूजन → दीप पूजन → मंत्र-जप → आरती → नैवेद्य।

माता लक्ष्मी के लिए विशेष साधना
माता लक्ष्मी के सामने घी का दीपक प्रज्वलित करें और श्रद्धापूर्वक जप करें—
॥ ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ॥
सामर्थ्य के अनुसार 108 बार या अधिक जप किया जा सकता है।
इसके पश्चात श्रीसूक्त का पाठ करना और कमल के फूल या कमल बीज ( कमल गट्टे) अर्पित करना विशेष रूप से उत्तम माना जाता है।

श्रीकृष्ण आराधना
राधा-कृष्ण के समक्ष दीपक जलाकर—
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
का 108 बार जप करें।
इसके बाद राधा-कृष्ण नाम-संकीर्तन, भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत के कृष्ण-लीला प्रसंग का श्रवण-पाठ व तुलसी अर्पण किया जा सकता है।

चंद्रदेव को अर्घ्य देने की विधि
रात्रि में चंद्रमा के दर्शन होने पर एक पात्र में जल लेकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत और सपेद पुष्प डालें।
चंद्रमा की ओर मुख करके अर्घ्य देते हुए कहें—
॥ ॐ सोमाय नमः ॥
या
॥ ॐ चन्द्राय नमः ॥
इसके बाद प्रार्थना करें—
“हे चंद्रदेव! हमारे मन को शीतलता, प्रसन्नता एवं शांति प्रदान करें तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनाए रखें।”

शरद पूर्णिमा की खीर
इस दिन दूध, चावल और केसर से बनी खीर का भगवान को भोग लगाने की परंपरा है।
रात्रि में भगवान को भोग लगाकर खीर को स्वच्छ एवं ढके हुए पात्र में रखना और प्रसाद के रूप में ग्रहण करना कई क्षेत्रों की प्रचलित परंपरा है।
विशेष रूप से मंदिर में केसरयुक्त खीर का प्रसाद वितरण शरद पूर्णिमा के कार्यक्रम को अत्यंत आकर्षक और भक्तिमय बना सकता है।

शरद पूर्णिमा का मुख्य संदेश
“चंद्रमा की शीतलता मन में उतरे,
माता लक्ष्मी की कृपा घर में आए,
श्रीकृष्ण की भक्ति हृदय में जागे,
और जीवन में धर्म, शांति एवं सद्भाव का प्रकाश फैले।”

यह भक्ति, जागरण, आत्मचिंतन, लक्ष्मी-नारायण आराधना और श्रीकृष्ण प्रेम का पावन अवसर है।

शरद पूर्णिमा का महत्व,महिमा व पूजन वैदिक विधान

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